मराठी साहित्य, संस्कृती आणि लेखनाचे व्यासपीठ

आवडलेलं काही...

माधुरी विनायक · · जनातलं, मनातलं
लेखनप्रकार
कविता हा अभिव्यक्तीचा सहजसोपा आणि तितकाच हवाहवासा आविष्कार. मला कविता आवडते. अगदी हायकू, चारोळी, छंदबद्ध आणि मुक्तछंद हे आणि असे सगळेच प्रकार आवडतात. उर्दू शायरी हा असाच जिव्हाळ्याचा विषय. हायकू तीन ओळींचा, त्याहून कमी, म्हणजे दोनच ओळींमध्ये केवढं सांगता येतं, ते सिद्ध करणाऱ्या अशा असंख्य ओळी भेटत राहिल्या. नकळत मनात रेंगाळत राहिल्या. रचनाकार नाही माहिती, पण या ओळींचा उल्लेख आला की त्या शब्दप्रभूंना मनोमन सलाम केला जातो. अशाच काही ओळी देतेय... वाचकांनी भर घातली तर माझा हा आनंदाचा ठेवा आणखी वाढेल... सजदे में आज भी झुकते है सर बस, मौला बदल गया देखो... जरूरत है मुझे कुछ नये नफरत करनेवालों की पुराने वाले तो अब चाहने लगे है मुझे.... मेरे रोने की हकीकत जिस में थी एक मुद्दत तक वो कागज नम रहा... है परेशानियां युं तो बहुत सी जिंदगी में तेरी मोहब्बत सा मगर कोई तंग नही करता.... वो कहानी थी चलती रही मै किस्सा था, खत्म हुआं... दिल से ज्यादा महफूज जगह नही दुनियां मे पर सबसे ज्यादा लापता भी लोग यही से होते है... ऐ इश्क, जन्नत नसीब न होगी तुझे बडे मासूम लोगो को तूने बरबाद किया है.... शौक थे अपने- अपने किसी ने इश्क किया... कोई जिंदा रहा... दीदार की तलब हो तो नजरे जमाएं रखना क्योंकी नकाब हो या नसीब सरकता जरूर है... छीन लेता है हर अजीज चीज मुझसे ऐ किस्मत के देवता, क्या तू भी गरीब है... हवाएं हडताल पर है शायद आज तुम्हारी खुशबू नही आयी... डुबे हुओ को हमने बिठाया था अपनी कश्ती में यारो... और फिर कश्ती का बोझ कह कर हमे ही उतारा गया... कोई तो है मेरे अंदर मुझे सम्भाले हुए... जो इतना बेकरार होते हुए भी बरकरार हूं... जुबाँ न भी बोले तो मुश्किल नही फिक्र तब होती है जब खामोशी भी बोलना छोड दे... वो भी आधी रात को निकलता है और मै भी ... फिर क्यो उसे चाँद और मुझे आवारा कहते है लोग... फिक्र तो उसकी आज भी करते है, बस जिक्र करने का हक नही... काश के वो लौट आए मुझसे ये कहने की तुम कौन होते हो मुझसे बिछडनेवाले... मेरे शब्दो को इतनी दिलचस्पी से ना पढा करो कुछ याद रह गया तो हमे भूल नही पाओगे...

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