मराठी साहित्य, संस्कृती आणि लेखनाचे व्यासपीठ

मिपाकरलक्षणे

सस्नेह · · जे न देखे रवी...
लेखनविषय:
काव्यरस
| जय जय रघुवीर समर्थ | समर्थांसी मनोभावे प्रार्थुनी, मिपाकरांची काही येक लक्षणे डोळियांस दिसली ती श्रोतींयांस विनयपूर्वक सादर . || श्रीमिसळपाव || | मिपाकरलक्षणनाम समास प्रथम | ओम नमोजी संस्थळचालका | नीलकांता मिपामालका | कृपादृष्टीं सदस्यलोका | अवलोकिजे |१| तुज नमू रेवतीतै | अक्षयकान्ते आणि पैसातै | धागीं ठेवी कृपाहस्ते | लेखकुंच्या |२| वंदुनिया सल्लागारचरण | करूनिया संपादकस्मरण | परिक्षणार्थ मिपकरलक्षण | बोलिजेल |३| येक वोरीजिनल एक डूआयडी | उभयलक्षणे सरळ-कानडी | येकयेका घालुन सांगडी | शब्द मांडिले |४| डूआयडीचे लक्षण | पुढिले समासी वर्णन | सावधपणे वाचकजन | परिसोत पुढे |५| आता प्रस्तुत वोरीजिनल | लक्षणे ती तुंदिल | परी काही येक अचळ | होऊन ऐका | ६| जे मिपाकर जन | जयांस जगीं सर्व ज्ञान | जे केवळ आश्रयस्थान | मऱ्हाटीचे |७| संस्थळी सत्वर संचारी | स्वामी-संपादकीं स्तुती करी | कंपू जमवितो अंतुरी | तो येक मिपाकर |८| सांडून सर्वही ज्येष्ठ | नव-आयडीस मानी श्रेष्ठ | सांगे दुज्या संस्थळीची गोष्ट | तो येक मिपाकर |९| समस्त धागे प्रेमें धरी | सदस्यहृदयी वास करी | वक्रोक्तीविण प्रतिसाद करी | तो येक मिपाकर |१०| संपादकांवरी अहंता | अंतरी धरी आढ्यता | अकलेविण दावी विद्वत्ता | तो येक मिपाकर |११| आपुलेच धागे प्रतिसादवी | दुजांचे बाजार उठवी | पॉपकॉर्नचे ढीग दावी | तो येक मिपाकर |१२| विनाकारण वाद करी | प्रतिसादांचे पुच्छ धरी | बहुतांसी टीका करी | तो येक मिपाकर |१३| कंपू धरुनिया हाती | नवागतांस पाडी भ्रांती | धाग्यांच्या वळतो वाती | तो येक मिपाकर |१४| बहु विचक्षण इये जन | तयांमध्ये दावी शहाणपण | परसंस्थळीचे उच्छिष्ट सेवन | करी तो येक मिपाकर |१५| मान अथवा अपमान | लागे ज्यास समान | संपादनाचे ना अनमान | तो येक मिपाकर |१६| धरून प्रतिसादांची आस | धागे पाडी भसाभस | ‘शतकीं’ धरी मनी आस | तो येक मिपाकर |१७| क्रमश :

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